Sunday, 16 February 2014

मेरे इस
नीरस मन में
ख़ाली और
तन्हा घर में
मेहमां
बन आते हो तुम
धूप से चमकीले
आँखों को
चौंधियाते हो तुम

मैं
हाथों से
तुम्हें तन पर
मलना जो चाहूँ
छाव बन
छिटक जाते हो तुम

मेरी
गोध से पाँवो पर
कभी माँ के सर से
ग़ुलाब के फूलों पर
ठिठोली
करते हो तुम

मैंने
आँचल में जो
समेटना चाहा तुमको
महक बन
बिख़र जाते हो तुम
तुम
एहसास हो
हवाओं सा
तन को छू कर
बहका
जाते हो तुम

तुम्हें
कैसे भूलूं और
कैसे न याद करूँ

दूर
हो कर भी
पास हो तुम
हर पल बहते
साँसों में
प्यार भरी वो
सुवास हो तुम
मेरे
पास हो तुम......

4 comments:

  1. सच, पढ़ कर निशब्द हूँ...कोई इतना अच्छा कैसे लिख सकता है !

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    1. कोशिश है वक़्त को भी निशब्द कर सकूँ ....बहुत बहुत आभार सर .....

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  2. एक हसीं ख्वाब की तरह खूबसूरत नज़्म।

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    1. शुक्रिया संजय जी ....

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