Tuesday, 25 March 2014

प्रेम तो है नहीं कहीं ....

प्रेम तो है नहीं कहीं
शरीर है बस
बाक़ी जो है वो
लगाव है जो जरूरतों का पुलिंदा भर है

प्रेम
बातों में लड़ता-झगड़ता
हार कर वापस दौड़ जाता है
काले घने
जंगलों में सो जाता है
तब तक
जब तक शरीर जागता रहता है
तड़पता रहता है, भूखा रहता है
प्यास से चीख़ता और
लालायित रहता है स्पर्श के लिए

शरीर ही
आधार है कुछ रिश्तों का या
यूँ कहें की क़रीब होने का

रिश्ता……….कैसा रिश्ता ?
कोई रिश्ता नहीं
शरीर के आगे
कोई रिश्ता नहीं टिका
गर्म, भूख से
तपे शरीर की महक
उसकी हल्की सी
ताह ही काफ़ी है रिश्तों के
भस्म हो जाने के लिए
उसकी मर्यादाओं को ख़ाक
करने के लिए
कमज़ोर
तन्हा अहसासों की भटकती
नंगी रातों को हर
शरीर अपनी आग़ोश में लेना चाहता है
दबोचना चाहता है,
मसलना चाहता है, भोगना चाहता है
सोना चाहता है ……..

मन, भावनाएं,
एहसास, संवेदनाएं और
इच्छाएं दबे पाँव
ऐसी कमज़ोर रातों में
डर कर, छुप कर भाग खड़ी होती है

कहीं इनका
ज़बरन अपहरण न हो जाये
कोई वासना से लिप्त
शरीर इनका बलात्कार न कर ले
कहीं कुचल न दें
इनके मर्म, इनकी आत्मा को

इसलिए
प्रेम और प्रेम सम्बंधित
भावनाएं, तमन्नाएँ
एहसास और अनोखी छुअन सभी
प्रेम की अदायें है, शोखियां है
शरीर से अलग़
आत्मा की देन है जो
अहसासों से अहसासों का मिलन है
इसमें शरीर कहीं नहीं है

जहाँ शरीर है
वहाँ सिर्फ शरीर है
कोई रिश्ता नहीं, कोई उम्र का ठींकरा नहीं
कोई अपमान नहीं, कोई उलंघन,
कोई मर्यादा नहीं

यह शरीर
सब पर भारी है
सबके आगे जीता है, सबसे जीता है

शरीर
सिर्फ सोना जानता है
उसके कोई नियम, कोई सीमा नहीं
है तो बस
भूख सिर्फ ………भूख!!!

Tuesday, 18 March 2014

दिल
का आईना
खुर्चा, तिरछा और
चटका हुआ
जिसमें मेरा अक्स
बिखरा नज़र आता है
कई टुकड़ों में

कभी कभी जब
दर्द कि सिरहन बढ़ जाती है
तब ये बिखरे टुकड़े भी
ज़र्रा ज़र्रा हो जाते है

कोई
दवा नहीं इसकी
न कोई
इस टूटे आईने को
फिर से सवारने वाला

हाँ
हर बार एक नयी
चोट, एक खरोंच और
एक टुकड़ा और करने वाले
बहुत मिले

मुझसे भी अब
ये नहीं सँवारा जाता,
सजाया जाता
मैं उब गयीं हूँ, थक गयीं हूँ
रोज़ सीधा करना,
हर टुकड़ा तलाशना और जोड़ना
खुरचन को मिटाना

नहीं
होता अब मुझसे ये
अब नहीं होता…

Saturday, 15 March 2014

हल्की हल्की सी
ये ख्वाहिशें
नर्म, मख़मली छुअन सी

दिल के झरोखों से
झाँका करती है
दुनिया की भीड़ को
कभी डरती हैं, छुपती हैं
और अक्सर सहम कर
झरोखें बंद कर
आ बैठतीं हैं धड़कनों संग

ख्वाहिशें मासूम है बहुत
पर हठी प्रवृति कि
डटी रहेंगी पर ख़त्म न होंगी
उड़ती है तमन्नाओं के
आसमां में
ऊँची ...... बहुत ऊँची

दूर तक फैला है इनका
जहान जो सतरंगी
इरादों से सजा,
खूबसूरत ख्यालों से बुना है
महकता है अरमानों के इत्र से,
दहकता है सपनों के अलाव से

इनका होना और
पूरा होना सवाल है अब तक
जवाब छुपा है परिवर्तन कि
भाषा में, नियमों के परे
कायदों के पीछे
और इनको लांगना
फिर से एक सवाल
उठाना है जिसके अंत का
कोई अंत नहीं

फिर भी कोशिश कर रही हूँ
जवाब तलाश रही हूँ
पर दुनिया के ढंग देख
भटकने का गुमां होता है
अपनी इच्छाशक्ति
पर भी कभी कभी
शक़ होता है

मैं गुम न हो जाऊँ कहीं
इसलिए इन
ख्वाहिशों को हर दिन
उम्मीदों का पानी देती हूँ
इरादों की धूप और
विश्वास कि स्वस्थ हवा देती हूँ
ताक़ि ये जीती रहें
और मैं भी ……..
नन्हीं नन्हीं
ख्वाहिशें जन्मी है
जैसे पतझड़ के बाद
नन्हीं कलियाँ
नन्ही कोपले

बड़े आग़ाज़ का
छोटा सा ख़ाका
बड़ी उम्मीदों की
छोटी सी किरन

उगने दो इन्हें
पनपने दो
कल की धूप के लिए
इनके साये बनने दो

करो तैयारी
खूबसूरत शुरुआत कि
सजाओ बस्ती
अपने जहान कि
के फिर
मौसम ने करवट ली है

फिर 
क़िस्मत ने दवात दी है
फिर खुशियों ने रहमत की है

जगने दो ख्वाहिशें
पकने दो ख्वाहिशें
के नया कुछ होने को है
परिवर्तन होने को है

इंतज़ार ख़त्म होने को है
मैंने
अपनी कुछ ख्वाहिशें
तुम्हारे लिए
बाँध कर रख दी है
जो तुम से
मिल कर पूरी होंगी

देखो ज़रा
इनके कोमल इरादों को
समझों
इनकी दिलक़श भाषा को
मैंने कितने जतनों से
इनको
तुम्हारे लिए है चुना

तुम
अपने दिल की
एक खिड़की खोल दो
इनके
आवागमन के लिए
बस यही
इनकी दुनिया होगी

तुम
एक एक कर
हर ख्वाहिश चुन लेना
हर एक के लिए
कुछ सपने तुम भी बुन लेना

हम
मिल कर फिर
इनके गर्म आलिंगन में
अपनी ज़िन्दगी बीता देंगे
और कुछ ख्वाहिशें
अपने सपनों के लिए सजा लेंगे
इनकी छाव तले
हम अपना आशियाँ बना लेंगे
हम अपना आशियाँ बना लेंगे……………

Wednesday, 12 March 2014

ये सोच कर तुम्हें
सोचना बंद कर दिया
कहीं सोच भी
बेवफ़ा न हो जाये

अफ़सोस
इसका भी हाल तुम सा निकला
जाते जाते
अटक गयी ज़ेहन में…..

Tuesday, 11 March 2014

मेरी 
बनायीं गयी तस्वीरें
क़ैद है
बंद लिफ़ाफ़े में

जब कभी भी
अपने कमरे में बैठ
बीते कुछ
पल याद करती हूँ
ये लिफ़ाफ़ा
खुदबखुद खुल जाता है
और ये तस्वीरें
साँस लेने लगती है

इनकी साँसों की
आवाज़ इतनी गहरी है की
मैं अपनी
तन्हाई से उबर आती हूँ
अक्सर ये
तस्वीरें मुझसे पूछती है
क्यूँ नहीं
तुम हमें खुले में साँस
लेने देतीं
क्यूँ 
इस दुनिया को
हमसे महरूम रखा है........ क्यूँ

और
मैं हर बार
मुस्कुरा कर उनको
समझाती हूँ

तुम जो
परायी हो गयीं तो
मैं
किस के सहारे जियुँगी
तुम ही तो
अब मेरा जीवन हो
डरती हूँ
तुम्हें खोने से
तुम्हारे अलग़ होने से
इसलिए तो तुम्हें
सहेजती हूँ, समेटती हूँ
सजाती हूँ, रंग भरती हूँ
और मेरे यूँ कहते ही 
मेरी तस्वीरें 
मुझे बाँहों में भर लेती है.......
पीले 
पत्तो का मौसम जा चुका है
ख़ाली दरख़्त
खाली हाथ, सुने नैन लिए
सड़कों के किनारे
इन्हें कहीं नहीं जाना
कोई इन तक नहीं आता
इसलिए बस
बहार के इंतज़ार में खड़े है

दूर तक फैले सुने, तन्हां 
रास्तों पर
सूखी सूखी हवायें बिछी हुई है 
उस पर ये
उदास सा, उतरा उतरा सा दिन
बहुत ऊबता है

सोचती हूँ
इनकी सखी बन जाऊँ
इनके बीच रह जाऊँ
पर इतनी ख़ामोशी उड़ती है यहाँ
की दम घुटने लगता है
हार कर मैं
चल पड़ती हूँ मेरी
और इनके जैसी
बेगानी, उलझी, गहरी
गुमसुम खोयी सी राहों पर

इन संग
लौट चली हूँ मैं भी अब
अपनी ज़िन्दगी……

Monday, 10 March 2014

जैसे
कोई सुरंग है वक़्त कि
तेरे मेरे दरमियाँ
लम्बी ....... बहुत लम्बी
जिसके बीच
मज़बूत पारदर्शी
शीशे का दरवाज़ा लगा है
एक तरफ़ उसके तुम और
दूजी तरफ़ मैं हूँ
उलझन ये की
इस पर ताला
लगा है जो मेरी ओर है
पर उसकी चाबी
तुम्हारे पास है

कहो अब.......
ये दरवाज़ा कैसे खुले?
तुम इस
वक़्त की सुरंग के
उस तरफ़ से
इस ओर तक
मेरे पास तक कैसे आओगे?
मझे कैसे पाओगे?

कहो…….. क्या मुझे पा सकोगे ?

Saturday, 8 March 2014

बहुत शोर है यहाँ.....

बहुत शोर है यहाँ
बहुत ज्यादा
मैं कैसे वो आवाज़ सुन सकूँ
जो मेरे लिए है

कितनी ही देर कानों पर हाथ लगा
सब अनसुना करती रही
लेकिन
शोर इतना है की मेरी हथेलियों को
भेद कर मेरे कानों पर बरस पड़ता है
मष्तिष्क की हर नब्ज़ थर्राने लगी है
नसों में आक्रोश भर गया है

अज़ीब शोर है यहाँ
जलन, ईर्षा, द्वेष, अपमान का,
भेदभाव का शोर
धधकता, जलाता शोर
इस तरहा बढ़ता जाता है की
इच्छाशक्ति इस के प्रभाव से
क्षीण होती जाती है
कैसे सेहन करूँ?
किस तरहा निर्वाह करूँ?

कई बार निश्चय किया
आवाज़ उठाऊँ, परास्त कर दूँ
इन कर्कश स्वरों को
पर अपनों से युद्ध, जीतना
और शिकस्त देना आसान नहीं है

मन का एक कोना
रोता है, बिलखता है जो अक्सर
भय से, आश्चर्य से घटित हो रहे
सिलसिलेवार आघात पर चौंकता है

रोज़ सवाल उठता है
कैसे अपने ही
घातक प्रहार कर देते है मन पर,
ह्रदय पर, भावनाओं पर
जिसकी चोट सीधे आत्मा को लगती है
और जिसके ज़ख्म
गहरे बहुत गहरे होते जाते है
जो दुखते है, चुभते है और रिसते है

ये कैसा शोर और किस कारण
आपसी द्वेष, नासमझी या
आपसी प्रतियोगिता के कारण

अपनों का होना सहारा होना है या
इस प्रकार के बैर का होना
जैसे निर्थक, खोखला, बेमायने और
बेमतलब होना……..

इस शोर को ख़त्म करना है
प्रयत्न बहुत हुए अब तक पर
अब प्रण करना है
इस शोर में
अपनी आवाज़ को बुलन्द करना है

हाँ अब.........
सब को ख़ामोश करना है ………..

Wednesday, 5 March 2014

शाम होते ही
दिल घबराने लगता है
इन गुज़रते
पहरों को टाला नहीं जा सकता
और मुझसे
इनको गुज़ारा नहीं जाता

सोचती हूँ
काश ....... सब उलट हो जाये
रात भर
दिन के काम काज़ हो जायें
और दिन में
मैं कहीं गायब हो जाऊँ
दिन
गुज़ारा नहीं जाता और
ये रातें बीतती नहीं

पर ये सब
मुमकिन ही नहीं
मुझे ये रातें पसंद नहीं

काश
ये रातें इन २४ घंटों से
गायब हो जायें
या मैं
इन रातों से …….काश!!!!!