Tuesday, 6 May 2014

सोचा था
इतना क़रीब हो कर
शायद वो मिल सके
जिसके लिए मेरे मन की जमीं
बंज़र हुए जाती है

थोड़ा मोह, प्रेम, स्नेह
ख्याल परवाह और विश्वास

तुम
मिले लगा तो था
मेघ बरसेगा और
फिर फूल खिल उठेंगे बहार के
पर मैं कैसे भूल गयी

तू ठहरा निरा पुरुष
तन के साथ तेरे मन का
क्या काम, क्या मोल

मैं मन
लेकर आयी थी
तूने तन की बोली लगा दी

निर्थक हो गया मेरा जीवन

विश्वास के बीज़ को
प्रेम की ज़मीं भी न मिल सकी और
तन का भूखा बाज़
मेरा विश्वास रूपी बीज़ ले उड़ा

मैं खाली हाथ
तकती हूँ तुझे और
मेरे पथराये होठ
चुप्पी की चादर ओढ़
प्रेम माँगते हैं

मैं
कह नहीं सकती
पर बिलख रही हूँ
मैं टूट रही हूँ
मैं टूट रही हूँ…

2 comments:

  1. वाह बेहतरीन..... जीवन के करीब से गुजरते शब्द ॥ एक एक शब्द ... .....बधाई

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    1. शुक्रिया संजय जी ...

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