Monday, 8 September 2014

हदें बेहतर है पर ..

बदलना
अच्छा है ....पर एक हद तक

और वो हद
खुद तय करनी होती है
ऐसी हद जिसके भीतर
किसी का दिल न टूटे
कोई रोये न....बीते लम्हें याद कर
वादे याद कर मलाल न करे

वो हद जो
दूर करे पर नफरत न पलने दे
याद रहे पर इंतज़ार न रहने दे


रिश्तों में बदलना
कभी भी सुख नहीं देता
चुभन...दर्द...अफ़सोस और
बेचैनी लिए
पल-पल ज़िन्दगी गिनता है

इन सब से परे
कितना आसान है
किसी बदलाव से पहले
बात करना .... गलतफ़हमियाँ मिटाना
हदों के पायदानों से निकल
कुछ कदम ''साथ'' चलना और
कुछ छूटने से पहले
अपने हासिल को ''अपना कहना''
हक जताना...गिला करना और
मनाना .....

हदें बेहतर हैं पर
बदलाव से पहले...हदें चुनने से पहले
झांके अपनों के मन में भी
शायद फिर
बदलाव की जरुरत न लगे.....

6 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

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    1. शुक्रिया रविकर जी ...

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  2. बिलकुल सहमत हूँ कविता में कही आपकी बातों से. !

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    1. अभी जी...बहुत बहुत शुक्रिया ...

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  3. पढ़ते ही एहसास होने लगता है

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    1. लेखनी एहसास कराये ...यही लेखनी का लक्ष्य है ....शुक्रिया आपका संजय जी

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